तेज़ी से घटती वन सम्पदा आज चर्चा में है। भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार 1999 में सघन वन 11.48 फीसद थे, जो 2015 में घटकर मात्र 2.61 फीसद रह गए। यह सिर्फ़ चिंता की बात नही है, स्वयं के भीतर देखने की बात है।कुमार चेलप्पन जी ने अपने लेख ‘तेज़ी से विलुप्त होते पवित्र उद्यान’ में जो सबसे मानीख़ेज़ बिंदु उठाया है वह है- इस समस्या को संस्कृति के आलोक में देखना। उन्होंने इस समस्या की वजह हमारे परम्परागत विश्वासों में आ रही कमी बताई है, जिससे वन संरक्षण में सहायता मिलती थी। यदि हम भारत की आज़ादी के बाद से इस समस्या की पड़ताल करें तो जान पड़ता है कि कुमार चेलप्पन जी का यह सूत्र ही इस बहस का प्रस्थान बिंदु होना चाहिए।
भारत में तेज़ी से घटते वन एक सामयिक समस्या नही हैं । बल्कि यदि हम इसे अपनी सांस्कृतिक गिरावट के समानांतर देखें तो हमें इसमें एक समानुपाती सम्बंध बनता दिखाई देगा । एक देश के तौर पर हम जब उपनिवेश नही भी रहे तब भीऔपनिवेशिक ढाँचे हमारे चिंतन को प्रभावित कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर भारत की आदि चेतना प्रकृति पूजक रही हैं। वेदों का ज़्यादातर हिस्सा प्रकृति से की गयी प्रार्थनाओं का ही दस्तावेज़ हैं। जिस उपभोक्तावाद की वजह से आज पर्यावरणका संकट आ पड़ा है , उसके दूसरी तरफ़ ईशोपनिषद का सूत्र है — तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा , यानी त्याग पूर्वक भोग करो । यहाँ तक कि भारतीय दर्शनों में प्रकृति के कण- कण में ईश्वर के एहसास की गंध है - ईशा वास्यमिदं सर्वं, जिसका सार कुछयूं है: जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । भारत में इस्लाम की सूफ़ी परंपरा में प्रकृति खुदा से जुड़ने का बेहद ज़रूरी माध्यम रही है। हिंदी साहित्य में सूफ़ी परम्पराओं से प्रभावित लगभग सभी प्रेमाख्यान प्रकृति केरंगमंच पर रचे गये हैं। बहुत दिन नही हुए, यहाँ लोगों ने पेड़ों से चिपक कर (चिपको आन्दोलन) उनकी रक्षा की है । यदि ऊपरी सूत्रों को हम अपनी जीवन पद्धतियों में समाहित कर रहे होते तो क्या हमारा नज़रिया वनों के प्रति इतना उदासीन हो सकताथा।
ऐसा क्या हो गया कि हम नागर संस्कृति के प्रभाव में वन सम्पदा को अनदेखा कर रहे है? इसकी वजह हमारी संस्कृति पर औपनिवेशिकता का दबाव है । उपभोक्तवाद आज प्रकृति के कण कण से मुनाफ़ा चाहता है। प्रकृति के एकांत में साधना की संस्कृति यूनान की चार दीवालों में सूखी नागर संस्कृति में तब्दील हो रही है इसलिए अब पेड़ लग भी रहे हैं तो घर की सुंदरता के लिए न कि ‘सर्वे भवंतु सुखिना’ के अर्थ में । इसके लिए एक लम्बी विऔपनिवेशिक मुहिम की ज़रूरत है जो कि आजयूरोप के ग़ुलाम रहे सारे देश कर रहे हैं। जब हम अपने सत्व की तलाश कर अपनी संस्कृति के आलोक में अपनी जीवन पद्धति बरतेंगे तो कम से कम सांस्कृतिक वजहों से वन सम्पदा नष्ट नही होगी। हालाँकि यह बेहद ज़रूरी है कि उन समस्तपरम्पराओं की व्यवहारिक पड़ताल भी हो जिनकी वजह से आज प्रकृति की कई सम्पदाएँ दूषित हो रही हैं ।
आशुतोष तिवारी
शोध छात्र, हिंदी विभाग AMU

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